Sunday, May 22, 2011

कोई भी व्यक्ति बिना भावों के जी नहीं सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रिय



हमारा शरीर स्थूल और भौतिक है, हम इसके हर अंग और कार्यो को देख सकते हैं, उनका आकलन कर सकते हैं, ऎसा हमारा मानना है। किन्तु, वास्तविकता यह है कि इसका संचालन हमारी बुद्धि करती है, हमारा भाव-तंत्र करता है जिसको हम न देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। शरीर में अपने आप तो केवल प्राकृतिक क्रियाएं ही हो सकती हैं, अन्य कुछ नहीं।

कोई भी व्यक्ति बिना भावों के जी नहीं सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रियाएं होती हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही इनका आधार तय करता है। भाव कहां से आते हैं?

भाव हमारे अनुभवों और दृष्टिकोण का मिश्रण कहे जा सकते हैं। हमारे अनुभव चेतनागत होते हैं। जिस प्रकार हमारी इच्छा मन में स्वत: उठती है, उसी प्रकार हमारे भाव भी स्वयं स्फूर्त होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि इच्छा का स्वरूप स्वतंत्र होता है और भावना हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ढली होती है।

भावना हमारे सूक्ष्म और कारण शरीरों से जुड़ी होती है, क्योंकि यह स्वयं सूक्ष्म है। इसका प्रतिबिम्ब होता है- हमारा आभा मण्डल। उसे हमारा भावनात्मक शरीर कह सकते हैं। दिनभर हमारे भावों के साथ आभा-मण्डल में भी परिवर्तन होते रहते हैं। आज आभा-मण्डल के अध्ययन में विश्व स्तर पर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई हैं। आभा- मण्डल में दो तरह के परिवर्तन होते हैं- रंगों के रूप में और तरंगों के रूप में। इनका विश्लेष्ाण करके व्यक्ति के भावों का आकलन किया जा सकता है। आज वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति का सारा खेल ऊर्जा और पदार्थ के एक-दूसरे में परिवर्तित होने के सिद्धांत पर चलता है। हमारे भाव भी ऊर्जा की श्रेणी में आते हैं, इनको देखना, समझना और मापना भी सम्भव है। जब भावनाओं के द्वारा हमारे मन और शरीर में अनेक क्रियाओं का संचालन होता है तो निश्चित है कि वहां कोई शक्ति है।

No comments:

Post a Comment