Friday, May 6, 2011

आत्मविश्वास पाने के दूसरे पायदान पर है प्रेजेंट माइंडेड बनना।

आत्मविश्वास पाने के दूसरे पायदान पर है प्रेजेंट माइंडेड बनना। जो हमारे
चारों ओर चल रहा है, उसे कहते हैं प्रेजेंट माइंडेड 'वर्तमन'। वर्तमन
यानी वर्तमान में, अभी क्या चल रहा है, उसे देखनेवाला मन। वर्तमान में जो
चल रहा है, उसे साक्षी भाव से देखा जाए और पूरा देखा जाए। प्रेजेंट
माइंडेड में सिर्फ एक पहलू नहीं है।



अगर आपको कहा जाए कि चारों तरफ जो अलग-अलग आवाजें आ रही हैं, उन्हें
सुनें तब आप उन्हें कैसे पूरे ध्यान से सुनेंगे। जब आप उन आवाजों को सुन
रहे हैं तो आप प्रेजेंट माइंडेड हो गए।



आप यह प्रयोग एक मिनट तक करके देखें कि आपको चारों ओर किस तरह की अलग-अलग
आवाजें आ रही हैं। इसी वक्त (अगर संभव है तो) पुस्तक नीचे रख दें और यह
प्रयोग करें। अब आपने यह प्रयोग करके तरह-तरह की आवाजें सुनी होंगी। आपने
यह प्रयोग कान के साथ किया मगर उसमें सभी बातें नहीं जुड़ी। किसी ने
आंखें खोलकर भी देखा होगा कि किस तरह के अलग-अलग रंग चारों तरफ दिखाई दे
रहे हैं और नाक के साथ कौन-सी अलग-अलग सुगंध आ रही है, जुबान के साथ
कौन-सा स्वाद महसूस हो रहा है, त्वचा के साथ किस प्रकार का अलग-अलग
स्पर्श है और शरीर पर कौन सी संवेदनाएं हैं..इत्यादि।



जो ध्यान की विधियां बनीं, उनका पहला लक्ष्य इंसान को प्रेजेंट माइंडेड
बनाना ही था। आप एक साथ सभी इंद्रियों के साथ कार्य नहीं कर सकते। कुछ
विधियां हैं कान के साथ, आंखों के साथ, जुबान के साथ, नाक के साथ, त्वचा
के साथ, सांस के साथ ताकि पूरा इंसान जागरूक हो पाए। जब सभी इंद्रियां एक
साथ कार्य करती हैं और मन के विचार भी सब एक साथ देखे जाते हैं तब उसे
प्रेजेंट माइंडेड कहा जाता है।

हर एक को सकारात्मक और वर्तमान विचारक बनना है। हमारे चारों तरफ क्या चल
रहा है, इस बात के लिए जागृत रहना है। हर घटना का ध्यान रखते हुए तथा हर
इंसान से बातचीत करने के साथ-साथ आपके अंदर क्या चल रहा है, यह भी जानें।
अपने आप से न छिपाएं, अपनी कमजोरियां देखें। अगर हम नकारात्मक सोचते हैं
तो आज की तारीख में हम जैसा भी सोच रहे हैं, वह हमारे सामने आए। ये बातें
स्पष्ट रूप से सामने आने पर ही पता चलेगा कि हमें कैसे विचार आने चाहिए
थे, किस समझ से हमें कौन से विचार आते हैं। अगर आप यह जानने लग गए तो आप
मुक्ति के रास्ते पर चल पड़ेंगे। वर्तमान विचारक बनकर आपको अब्सेंट
माइंडेड नहीं बनना है।



अब्सेंट माइंडेड कम हों : आप सजग हैं और आप वर्तमान विचारक हो जाते हैं
तो अब्सेंट माइंडेडनेस कम हो जाती है। वरना आप अब्सेंट माइन्डेड
(अनुपस्थित मन) लोगों को जानते हैं कि उनका ध्यान दूसरी जगह होता है। कोई
भी चीज कहीं पर रख देने के बाद उन्हें यह याद ही नहीं रहता कि वह चीज
उन्होंने कहां रखी है। ऐसे लोग बाद में वह वस्तु ढूंढते रहते हैं। जो
वर्तमान विचारक हैं, वे अब्सेंट माइंडेड (भुलक्कड़) नहीं होते। नकारात्मक
विचारक की तरह आपको अब्सेंट माइंडेड भी नहीं बनना है।





नमन (नो माइंडेड) और अब्सेंट माइंडेड में बड़ा फर्क है। अबसेंट माइंडेड
में मन होता है, नो माइंडेड में मन नहीं होता। अब्सेंट माइंडेड में मन
यहां नहीं होता मगर कहीं और होता है, जैसे कि शून्य हो गया हो।





अब्सेंट माइंडेड में भी इंसान शून्य होता है मगर वह समाधि नहीं है। मन
कहीं और रमण कर रहा होता है। वह भूतकाल और भविष्यकाल में चक्कर लगा रहा
होता है।





आपने यहां समझा कि जब आप वर्तमान विचारक होने लग जाएंगे तब हर घटना में
अपने विचार भी देख पाएंगे। साथ ही साथ यह भी देख सकेंगे कि फलां इंसान के
सामने आने पर आपका उठना, बैठना, बोलना सब क्यों बदल गया? ऐसा क्या हो गया
कि आप कृत्रिम हो गए? आप बनावटी क्यों हो गए?

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