Saturday, March 12, 2011

अहंकार

मैं कौन हूं? 'आत्मविश्वास और घमंड'- इन दोनों शब्दों में बड़ा फर्क है।

घमंड का अर्थ अहंकार होता और आत्मविश्वास का अर्थ है अपने ऊपर विश्वास।

इस अंतर को समझना चाहिए, वरना लोग सोचते हैं कि इंसान में आत्मगौरव नहीं

होना चाहिए। उन्हें लगता है कि 'मैं दूसरों के सामने कुछ नहीं हूं' ऐसा

सोचना चाहिए। इस तरह वे दूसरी किस्म के अज्ञान में चले जाते हैं। जहां

अहंकार, तुच्छता और आत्महीनता भी नहीं है, वहां आत्मज्ञान का दर्शन होता

है।



जिसे खुद पर विश्वास है, वह सही कदम उठाता है। वह उतना ही खाना खाएगा,

जितना खाना उसे तकलीफ नहीं देगा। जिसे सिर्फ अहंकार है वह ज्यादा खाना खा

लेगा, चाहे उसे तकलीफ ही क्यों न हो जाए। अहंकारी चार लोगों को दिखाएगा

कि 'देखो, मेरी क्षमता और काबिलियत कितनी ज्यादा है! सभी को गुलाब जामुन

दिए जा रहे थे, मुझे ज्यादा मिले क्योंकि मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूं।'

दूसरों को दिखाने के लिए कि 'मैं वी.आई.पी. (विशेष) इंसान हूं, मुझे

ज्यादा दिया जाए', वह ज्यादा की मांग करेगा, ज्यादा खाएगा, बीमार होगा

मगर अकड़ा ही रहेगा। यह अहंकार का रूप है। अहंकार में वह ज्यादा खाएगा,

क्योंकि उसे अपने प्रति आदर नहीं है, सिर्फ लोगों के सामने दिखावे के लिए

वह अपनी हानि भी करने को तैयार हो जाता है।



एक बार एक राजनेता जब सरकारी कार्यालय में किसी काम से पहुंचा, तब

कार्यालय के कर्मचारी ने उन्हें कुछ समय ठहरने के लिए कहा। राजनेता को

बहुत बुरा लगा, उनके अहंकार को बड़ी चोट पहुंची। उन्होंने कर्मचारी से

कहा, 'मुझे ज्यादा समय रुकने की आदत नहीं है।' कर्मचारी ने कहा, 'थोड़ा

समय लगनेवाला है, आप तब तक सामनेवाली कुर्सी पर बैठ जाएं।' राजनेता ने

गुस्से में कहा, 'क्या तुम नहीं जानते कि मैं एक राजनेता हूं?' कर्मचारी

ने कहा, 'ऐसा है तो आप दो कुर्सियों पर बैठ जाएं।'



यह तो एक चुटकुला था, जो अहंकार पर चोट पहुंचाने के लिए बताया गया।

अहंकार भी कुछ इस तरह का ही होता है, चाहे जरूरत एक ही कुर्सी की हो,

लेकिन अपनी विशेषता बताने के लिए वह दो कुर्सियों की मांग करता है।



अहंकार का अर्थ और आदर का महत्व: अहंकार का मूल अर्थ है अपने आपको दूसरों

से अलग मानना, महसूस करना और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध करना।

इंसान में यह मूल अहंकार होता है कि 'मैं दूसरों से अलग हूं, मैं अपने

आपको दूसरों से अलग मानता हूं, अलग मानकर मैं नफरत लाऊं।' तब उसे यही कहा

जाता है कि 'अपने आपको अलग मान ही रहे हैं तो कम से कम दूसरों के प्रति

अपने मन में नफरत तो न जगाएं, नफरत से आप नरक के गड्ढे में गिर जाएंगे।

अपने आपको यदि आप श्रेष्ठ मान ही रहे हैं तो कम से कम दूसरों को नीचा

दिखाने की कोशिश तो न करें, जिससे आप ईर्ष्या व क्रोध की ज्वाला में तो न

जलें। अपने प्रति आदर रखने से संभावना है तो आप इस अहंकार से बाहर आ

जाएंगे।'



आप अपने प्रति आदर तभी दे पाएंगे, जब आप यह जान जाएंगे कि 'मैं कौन हूं?

मुझे अपने आपको जानना चाहिए तभी मैं खुश रह पाऊंगा, वरना मेरा विकास कैसे

होगा?' हमें स्वयं के प्रति आदर है तो हम चाहेंगे कि हम जल्द से जल्द

सत्य जानें। अपने प्रति आदर होना बहुत मुख्य है। शुरुआत वहीं से होगी।

स्वयं को आदर देने वाला इंसान गलतियों से बचने का रास्ता ढूंढ़ना चाहेगा।

वह कभी नहीं चाहेगा कि उसकी आजादी छिन जाए।

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